सोमवार, 3 अगस्त 2015

बढ़ती धार्मिक असहनशीलता

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मुझे एक बात का बहुत दुःख है कि आज़ादी के इतने साल बाद भी हम दूसरे धर्मो के साथ प्यार से रहना नहीं सीख पाए। आज भी कुछ धर्म के ठेकेदार लोगों को अपने हिसाब से ढालने में सफल हो रहे है। इन धर्मो के ठेकेदारों का केवल एक मक़सद होता है हमें बाँट कर हम पे राज करना। आज के सभ्य और शिक्षित समाज से हम अपेक्षा कर सकते हैं कि वह इस छोटी सोच से ऊपर उठ कर एक ऐसे समाज को बनाएगें जिसमें सभी लोग दूसरें धर्मो का सम्मान करेंगें। आज भारत के पीछे रहने का प्रमुखः कारण धार्मिक कट्टरपंथता है।

में धर्म का विरोधी नहीं हूँ पर में धर्म के नाम पर अंधविश्वास और कट्टरवाद को बढ़ाने के ख़िलाफ़ हूँ। धर्म के केवल एक मकसद है, हमें आध्यात्मिक ज्ञान का रास्ता दिखाना और एक अच्छे व्यक्ति बनाना , पर आज इस का बिलकुल उलटा हो रहा है। आध्यात्मिक ज्ञान तो बहुत पीछे छूट गया है और अंधविश्वास हम पर छा गया है। इस अन्धविश्वास और कट्टरवाद के कारण लोगों में नफ़रत फैल रही है, और लोगों का लोगों के ऊपर से विश्वास उठ रहा है।

अगर हम एक अच्छे समाज की रचना करना चाहते है तो हमें धार्मिक सहनशीलता को बढ़ावा देना होगा। हमें यह सही मायने में समझना होगा कि धर्म का असली मतलब क्या है और क्या एक धार्मिक इंसान के फर्ज होते है। इस कार्य में धार्मिक गुरु और राजनेता, लोगो का पथप्रदर्शन कर सकते है कि वह कैसे एक अच्छे इंसान बने अपने धर्म पर चलते हुए। पर आज इस का उलटा हो रहा है लोगों में नफ़रत और धार्मिक असहनशीलता फैला कर। लोगों का भी यह फ़र्ज बनता है कि वह सही और गलत की पहचान करे और एक अच्छे समाज की रचना करे.

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